भुवनेश्वर, (निप्र) : नुआपड़ा विधानसभा क्षेत्र में पिछले आम चुनाव से सुर्खियों में रहे आदिवासी नेता घासीराम माझी इस उपचुनाव में भी पूरे राज्य राजनीति के केंद्र में रहे। हालांकि इस उपचुनाव में भले ही कांग्रेस हार गई हो, लेकिन उम्मीदवार घासीराम माझी अपनी पहचान कायम रखने में सफल रहे हैं। उन्हें अब भी नुआपड़ा का योग्य और लोकप्रिय उम्मीदवार माना जा रहा है। जनता से उनका लगातार जुड़ाव उन्हें यहां का अपराजेय नेता बनाता है। इस उपचुनाव में उनकी मेहनत और जुझारू स्वभाव की हर ओर सराहना हुई है। बीजेपी जैसे 'डबल इंजनÓ दल व मजबूत संगठन के सामने लडऩा उनके लिए कठिन था, फिर भी उन्होंने बीजेडी जैसे पुराने सशञ्चत दल को पीछे छोड़कर अपनी लोकप्रियता का प्रमाण दे दिया।
:: चुनाव मैदान के पुराने खिलाड़ी हैं घासीराम ::
वकालत पेशे से जुड़े घासीराम माझी नुआपड़ा राजनीति के पुराने खिलाड़ी हैं। एक मजबूत संगठन वाले लोकप्रिय आदिवासी नेता ने 2009 में मायावती की बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) से चुनाव लड़ा और 17,823 वोट पाकर चौथे स्थान पर रहे। इसी तरह 2014 में कांग्रेस टिकट पर चुनाव लड़कर 39,654 वोट के साथ तीसरे स्थान पर आए। 2019 में फिर कांग्रेस से लड़े और 45,317 वोट पाकर दूसरे स्थान पर रहे। 2024 में तत्कालीन पीसीसी अध्यक्ष शरत पटनायक के चुनाव लडऩे के कारण घासीराम ने निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ा और 50,941 वोट लेकर दूसरे स्थान पर रहे, जबकि शरत केवल 15,000 वोट पर सिमट गए। इस उपचुनाव में कांग्रेस ने एक बार फिर घासीराम पर भरोसा जताया। उनकी सीधी लड़ाई बीजेपी के जय ढोलकिया और बीजेडी की स्नेहांगिनी छुरिया से थी।
:: संसाधनों के कमी के बावजूद रहे अडिग ::
अपनी मेहनत और लोकप्रियता के बावजूद घासीराम संसाधनों के अभाव से जूझते रहे। बीजेपी और बीजेडी उम्मीदवारों की तुलना में उनके पास बेहद कम आर्थिक साधन थे। कांग्रेस नेतृत्व की ओर से भी उन्हें अपेक्षित सहायता नहीं मिली। पीसीसी अध्यक्ष भञ्चत चरण दास भले ही नुआपड़ा में डेरा डाले हुए थे, लेकिन आर्थिक सहयोग के नाम पर कुछ नहीं दिया। उनकी रणनीति भी कमजोर रही। न उन्होंने वरिष्ठ नेताओं को भरोसे में लिया और न ही सबका सहयोग जुटा पाए। कांग्रेस का कोई भी केंद्रीय नेता नुआपड़ा नहीं आया। तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी की प्रस्तावित यात्रा भी अंतिम क्षणों में रद्द हो गई। इन कारणों से प्रचार में घासीराम बीजेपी और बीजेडी से काफी पीछे रह गए। न उनके लिए बड़ा नेता आया, न कोई रोड शो हुआ और न ही कोई बड़ी सभा। वह अकेले ही घर-घर जाकर वोट मांगते रहे। घासीराम के परिश्रम का नतीजा यह रहा कि उन्हें 40,121 वोट मिले।
हालांकि पिछले चुनाव से कम मिले, लेकिन उन्होंने बीजेडी को पीछे छोड़ते हुए एक बार फिर दूसरा स्थान बरकरार रखा, जो किसी सफलता से कम नहीं है। चुनाव परिणाम के बाद घासीराम ने निराशा और असहायता व्यञ्चत करते हुए कहा यहं काम और ईमानदारी की कोई कीमत नहीं। सब पैसे का खेल है। पैसा दोगे तो वोट मिलेगा। मेरे पास खर्च करने की क्षमता नहीं थी और न ही पार्टी ने मदद की।