बैल-हल जैसे उपकरण अब इतिहास के पन्नों में
नियाली, (निप्र) : कृषि पर आधारित पारंपरिक पर्व अक्षय तृतीया वर्षों से मनाया जाता रहा है, लेकिन बदलते समय के साथ इसकी वास्तविक पहचान धीरे-धीरे धूमिल होती जा रही है। कभी किसानों के जीवन का अभिन्न हिस्सा रहा यह पर्व अब सिमटकर केवल सरकारी औपचारिकताओं तक सीमित होता नजर आ रहा है।
नियाली, कंटापड़ा और बालिपाटणा प्रखंड के कई स्थानीय लोगों ने इस पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि आधुनिक तकनीक के प्रभाव में पारंपरिक देसी खेती प्रणाली लगभग समाप्ति के कगार पर पहुंच गई है। पहले जहां बैल और हल के माध्यम से खेती की शुरुआत अक्षय तृतीया के दिन शुभ मानी जाती थी, वहीं अब यह परंपरा कहीं खोती जा रही है।
सेवानिवृत्त प्राध्यापक डा बिधूभूषण साहू ने कहा कि बैल, हल जैसे पारंपरिक कृषि उपकरण अब केवल तस्वीरों और स्मृतियों तक सीमित रह गए हैं। उन्होंने इसे सांस्कृतिक और कृषि विरासत के लिए चिंताजनक स्थिति बताया। स्थानीय सामाजिक संगठनों के पदाधिकारियों ने भी इस पर अपनी राय रखते हुए कहा कि राज्य स्तर पर अब अक्षय तृतीया के अवसर पर केवल प्रतीकात्मक रूप से नेता और विभागीय अधिकारी बैल के साथ 'अक्षि मुठी अनुकूल' जैसे कार्यक्रम करते हैं, जो वास्तविक कृषि परंपरा का प्रतिबिंब नहीं है।
सेवा ओ सेवक संगठन के सचिव नीलकंठ महारणा और आम अधिकार मंच के सचिव प्रमोद कुमार नायक ने कहा कि इस पर्व की मूल भावना को पुनर्जीवित करने के लिए सरकार और समाज दोनों को मिलकर प्रयास करना होगा। उन्होंने सुझाव दिया कि किसानों को पारंपरिक खेती से जोडऩे और युवा पीढ़ी को इसकी महत्ता समझाने के लिए विशेष पहल की जानी चाहिए। अक्षय तृतीया केवल एक धार्मिक या औपचारिक आयोजन नहीं, बल्कि भारतीय कृषि संस्कृति की आत्मा रही है। यदि समय रहते इसकी परंपराओं को संरक्षित नहीं किया गया, तो यह पर्व केवल इतिहास के पन्नों में सिमटकर रह जाएगा।