माल भाड़ा भी 30 प्रतिशत हुआ महंगा, निर्यातकों ने जताई चिंता
भोपाल : पश्चिम एशिया में लगातार बिगड़ते हालात का मध्यप्रदेश से विदेशों में बासमती और उष्ण गैर-बासमती जैसे उच्च गुणवत्ता वाले चावल के निर्यात पर गंभीर असर दिख रहा है। इस पर राज्य के प्रमुख चावल निर्यातकों और उद्योग संचालकों ने चिंता जताई है। मध्यप्रदेश के रायसेन जिले के बासमती चावल और बालाघाट जिले के उष्ण गैर-बासमती चावल की विशेष पहचान है और इनका खाड़ी देशों सहित कई विदेशी मुल्कों में निर्यात होता है।
ऑल इंडिया राइस एक्सपोर्टर एसोसिएशन के महामंत्री अजय भालोटिया ने पीटीआई-भाषा से बातचीत में कहा कि पश्चिम एशिया में जारी युद्ध के कारण रायसेन जिले से विदेश में भेजे जाने वाला बासमती चावल बंदरगाहों, फैक्टरियों एवं वेयरहाउस में अटका हुआ है। उन्होंने कहा कि माल भाड़ा भी 30 प्रतिशत महंगा हो गया है जबकि कंटेनर की किल्लत भी हो गई है। भालोटिया ने कहा कि इन सबके चलते निर्यातकों को न केवल ज्यादा भाड़ा चुकाना पड़ रहा है बल्कि बंदरगाहों पर माल लटकने से आर्डर समय पर पूरा करना भी मुश्किल हो गया है। रायसेन जिले के मंडीदीप, सतलापुर, औबेदुल्लागंज, रायसेन, बरेली, उदयपुरा, उमरावगंज क्षेत्र में दो दर्जन से अधिक चावल फैक्टरियां संचालित हैं, जिसमें उच्च कोटि का बासमती चावल निकालकर खाड़ी के देशों को निर्यात किया जाता है। भालोटिया ने कहा कि इन चावलों का ईरान, इराक, सऊदी अरब, जॉर्डन और दुबई सहित खाड़ी के कई अन्य देशों में बड़ी मात्रा में निर्यात होता है। उन्होंने कहा कि ईरान के साथ अमेरिका और इजराइल के युद्ध के कारण निर्यात पूरी तरह बंद होने से जिले की धान मिल बंद पड़ी हैं, जिसने उत्पादकों एवं निर्यातकों की चिंता बढ़ा दी है। रायसेन चावल फैक्टरी के संचालक मनोज सोनी ने बताया कि खाड़ी देश में मांग नहीं होने से पूसा बासमती धान के दाम 300 से 500 रुपये प्रति ञ्चिवटल तक गिर गए हैं, जिसका सीधा असर किसानों पर पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि इससे धान की आवक भी घटी है और कच्चे माल की आपूर्ति प्रभावित होने से आपूर्ति श्रृंखला कमजोर पड़ी है। उन्होंने कहा कि यदि युद्ध लंबा चला तो छोटे और मध्यम उद्योगों पर ज्यादा प्रभाव पड़ेगा।
एसोसिएशन ऑफ ऑल इंडस्ट्रीज के पूर्व अध्यक्ष राजीव अग्रवाल ने बताया कि युद्ध के कारण जिले की अर्थव्यवस्था को झटका लगा है। उन्होंने कहा कि समुद्री मार्ग से माल भेजने के लिए पर्याप्त कंटेनर तक उपलब्ध नहीं हो पा रहे हैं। उन्होंने कहा, पहले यहां एक कंटेनर 2500 डॉलर में मिल जाता था। अब वह 3200 में भी आसानी से उपलब्ध नहीं है। भाड़ा बढऩे से निर्यात लागत में सीधा इजाफा हुआ है।