नई दिल्ली : सरकार ने निम्न श्रेणी के लौह अयस्क के लिए मूल्य निर्धारण मानदंडों में संशोधन करने को नियमों में बदलाव की मंगलवार को घोषणा की। इस कदम का उद्देश्य बर्बादी पर अंकुश लगाना और ऐसे भंडार के उपयोग को बढ़ाना है ताकि इस्पात उद्योग को स्थिर आपूर्ति सुनिश्चित की जा सके। इससे निचले ग्रेड वाले संसाधनों को व्यवहार्य उपयोग में लाने की उम्मीद है जिससे उच्च ग्रेड के भंडार की कमी की समस्या का समाधान होगा और वैज्ञानिक खनन पद्धतियों के माध्यम से खनिज संरक्षण को बढ़ावा मिलेगा। आधिकारिक बयान में कहा गया, खान मंत्रालय ने 10 अप्रैल, 2026 को खनिज (परमाणु एवं हाइड्रोकार्बन ऊर्जा खनिजों को छोड़कर) रियायत (तृतीय संशोधन) नियम, 2026 अधिसूचित किए हैं जिनमें सीमा मूल्य से नीचे हेमाटाइट लौह अयस्क के औसत विक्रय मूल्य (एएसपी) के प्रकाशन की पद्धति निर्धारित की गई है। इसमें बैंडेड हेमाटाइट क्वार्टजाइट (बीएचक्यू) और बैंडेड हेमाटाइट जैस्पर (बीएचजे) भी शामिल हैं। खनन मंत्रालय के अनुसार, यह संशोधन 45 प्रतिशत की सीमा से कम लौह (एफई) सामग्री वाले लौह अयस्क के मूल्य निर्धारण के लिए एक ढांचा प्रदान करता है जिसमें बीएचक्यू और बीएचजे भी शामिल हैं। बैंडेड हेमाटाइट ञ्चवार्टजाइट और बैंडेड हेमाटाइट जैस्पर निम्न श्रेणी की प्रीकैम्ब्रियन लौह-युक्त चट्टानें हैं जिन्हें अक्सर निम्न श्रेणी के अयस्क के रूप में माना जाता है। संशोधित नियमों के तहत, 35 प्रतिशत से 45 प्रतिशत से कम एफई सामग्री वाले लौह अयस्क के लिए औसत विक्रय मूल्य (एएसपी), 45 प्रतिशत से 51 प्रतिशत से निम्न श्रेणी वाले अयस्क के एएसपी का 75 प्रतिशत निर्धारित किया जाएगा। वहीं 35 प्रतिशत से कम एफई सामग्री वाले अयस्क के लिए एएसपी इसी मानक का 50 प्रतिशत होगा। किसी खनिज का सीमा मूल्य वह स्तर होता है जिसके नीचे खनन के बाद प्राप्त सामग्री को अपशिष्ट के रूप में छोड़ा दिया जाता है। प्रसंस्करण एवं परिशोधन (बेनीफिसिएशन) प्रौद्योगिकियों में प्रगति से बीएचक्यू तथा बीएचजे जैसे सीमा से नीचे के लौह अयस्क संसाधनों को उन्नत कर उच्च श्रेणी के अयस्क में बदलना संभव हो गया है, जो इस्पात उत्पादन के लिए कच्चे माल के रूप में उपयुक्त है।