बजट आकार के अनुसार नहीं हो रहा काम
सरकारी कर्मचारी के लिए मुश्किल में सरकार
भुवनेश्वर, (निप्र) : राज्य सरकार ने शुक्रवार को 2026-27 आर्थिक वर्ष के लिए विधानसभा में बजट पेशकिया है। पिछले वर्ष की तुलना में यह 30 हजार करोड़ अधिक है। 2025-26 में बजट आकार 2 लाख 90 हजार करोड़ था, जबकि 2026-27 के लिए सरकार ने 3 लाख 10 हजार करोड़ का बजट पेश किया है। सबसे बड़ी बात यह है कि सरकार जनता को गुलाबी चित्र दिखा रही है, लेकिन इसका वास्तविक असर जमीनी स्तर पर कितना हो रहा है, इस पर कोई नजर नहीं है। यदि पिछले वर्ष के बजट खर्च का मूल्यांकन किया जाए, तो यह बजट तैयार करने वाले सचिवों और अधिकारियों की कार्यकुशलता स्पष्ट रूप से सामने आता है। इस वित्तीय वर्ष को समाप्त होने में अभी एक महीने से अधिक का समय है, लेकिन यदि विभागीय खर्चों को देखा जाए, तो ज्यादा वेतन लेने वाले बाबुओं के कार्यकुशलता पर सवाल उठ जाता है।
बजट में विभिन्न विभागों के खर्चे नहीं हो पा रहे हैं, जिससे सरकार के लिए गंभीर स्थिति उत्पन्न हो गई है। पिछले दो वर्षों में सरकार लोगों की उम्मीदों और आकांक्षाओं को पूरा करने की कोशिश कर रही है, लेकिन प्रशासनिक विफलताओं के कारण आलोचनाओं का सामना कर रही है। विकसित ओडिशा के लक्ष्य की ओर बढऩे के लिए सरकार के अधिकारियों की विफलताएं हर क्षेत्र में ब्रेक का काम कर रही हैं। इस स्थिति में सरकार के अधिकारियों के खिलाफ विरोधियों की आलोचना हो रही है। वित्तीय खर्च के संदर्भ में सरकार हलचल में है। राज्य की बीजेपी सरकार ने बजट में रिकॉर्ड वृद्धि करते हुए इसे 2 लाख 90 हजार करोड़ तक पहुंचाया था, साथ ही विभिन्न विकास योजनाओं को लागू करने के लिए लोगों का दिल जीतने की कोशिश की थी। हालांकि, इस स्थिति को देखते हुए अतिरिञ्चत बजट खर्च 17,440 करोड़ निर्धारित किया गया था, लेकिन सरकार के बजट खर्च के हिसाब से अब यह एक बड़ी चिंता बन गई है। वित्तीय वर्ष समाप्त होने में अब केवल दो महीने से भी कम समय बचा है, लेकिन पिछले जनवरी के अंत तक भी कुल बजट का 50 प्रतिशत खर्च नहीं किया जा सका। कुछ विभाग तो वित्तीय खर्च के मामले में बहुत पीछे रह गए हैं। मिली जानकारी के अनुसार, विज्ञान और कारीगरी विभाग ने मात्र 25.94 प्रतिशत खर्च किया, खनिज और उद्योग विभाग ने 21.4 प्रतिशत, जल संसाधन विभाग ने 39.67 प्रतिशत, और योजना तथा समन्वय विभाग ने मात्र 30.6 प्रतिशत खर्च किया है।
इसी तरह, वित्त, एससी/एसटी विकास विभाग, गृह, पंचायत राज, श्रम, खेल और युवा व्यापार विभागों ने 50 प्रतिशत से कम खर्च किया है। वित्तीय खर्च की जिम्मेदारी बाबुओं के हाथ में होती है, तब सरकार उनके लिए मुश्किल है। पिछले विधानसभा सत्र में विपक्ष ने इस पर सवाल उठाया था, और सरकार ने नए तरीके से इसे टालने की कोशिश की थी। इस बार हालांकि, विपक्ष ने इसे छोडऩे का कोई इरादा नहीं दिखाया। सरकारी कर्मचारी की ढिलाई के कारण, वित्तीय खर्च के मामले में पिछड़े विभागों के मंत्रियों के लिए सरकार का क्या जवाब होगा, यह अब भी स्पष्ट नहीं है। राज्य और जिला योजना बोर्डों से लेकर पश्चिम ओडिशा विकास परिषद जैसी संस्थाओं में भी समान स्थिति देखने को मिल रही है। कुछ क्षेत्रों में वित्तीय खर्च के लिए प्रस्ताव भी नहीं आ सके हैं। केवल पश्चिम ओडिशा विकास परिषद का वार्षिक बजट 500 करोड़ से अधिक था, लेकिन परिषद के अध्यक्ष और सदस्य पदों के खाली होने के कारण यह खर्च नहीं हो सका। सिर्फ राजनीतिक नियुञ्चितयां ही नहीं, कृषि उत्पादन आयोग जैसे महत्वपूर्ण पदों के लंबे समय तक खाली रहने के कारण कई सचिवों के हाथों में महत्वपूर्ण विभागों का वित्तीय खर्च पूरी तरह से प्रभावित हो रहा है। इसी तरह राज्य योजना बोर्ड सहित जिला स्तरीय योजना समितियों में पदों के खाली रहने के कारण काम में परेशानी आ रही है।
इसलिए, नई सरकार के लिए जिला स्तर की आवश्यकताओं और वित्तीय संचालन की विस्तृत निगरानी न हो पाने के कारण खर्च में भी कमी आई है। वित्तीय खर्च में गिरावट के कारण सरकार अब आलोचना के साथ-साथ लोगों के करीब आने के लिए कार्यकारी योजनाओं को अधूरा छोडऩे की स्थिति में है। दूसरी ओर, राज्य कांग्रेस अध्यक्ष भञ्चत चरण दास ने बजट पर टिप्पणी करते हुए कहा कि राज्य सरकार द्वारा पेश किया गया बजट हाथी के जैसे है और खर्च चिंटी जैसा है। वर्तमान वित्तीय वर्ष के समाप्त होने से पहले, सरकार 50 प्रतिशत खर्च भी नहीं कर पाई है। अंत में, सरकार शेष खर्च को समय से पहले दबाव डालकर करना चाह रही है, जिससे भ्रष्टाचार और अनावश्यक खर्च बढ़ सकते हैं। यदि खर्च नहीं हुआ तो राज्य का विकास कैसे होगा।