कटक, (रोहन मोहंती) : जंगल में भालू, सब्जी में आलू-कटक जिले में यह कहावत कभी आलू की भरपूर खेती और उसकी लोकप्रियता का प्रतीक हुआ करती थी। एक समय था जब ओडिशा, खासकर कटक जिले के लगभग हर प्रखंड में बड़े पैमाने पर आलू की खेती होती थी। यह किसानों के लिए एक लाभदायक नकदी फसल थी। लेकिन आज हालात बदल चुके हैं। सरकारी उपेक्षा और बंद पड़े शीतगृहों (कोल्ड स्टोरेज) ने इस खेती को लगभग समाप्ति की कगार पर पहुंचा दिया है। आलू जल्दी खराब न हो और लंबे समय तक ताजा बना रहे, इसके लिए राज्य सरकार ने सहकारी समितियों के माध्यम से कई शीतगृहों का निर्माण कराया था। इनका उद्देश्य किसानों को बेहतर भंडारण सुविधा देकर उचित समय पर बाजार में फसल बेचने का अवसर देना था, जिससे उन्हें अच्छा मुनाफा मिल सके। कटक शहर में आलू लाने वाले किसान मुक्चय रूप से तीन प्रमुख शीतगृहों पर निर्भर थे-बहुग्राम (सालेपुर प्रखंड) स्थित बापूजी शीतगृह, कटक सदर प्रखंड के 42 मौजा क्षेत्र का शीतगृह, नियाली प्रखंड के लक्षेश्वर शीतगृह ।
1964 में बना बापूजी शीतगृह, 2001 से बंद
बहुग्राम का बापूजी शीतगृह वर्ष 1964-65 में स्थापित हुआ था। बारबोतिया, आटोडा, पाटपुर, प्रधानपड़ा, इच्छापुर, सालेपुर, निश्चिंतकोइलि और नेमाल जैसे क्षेत्रों के किसान यहां अपनी उपज सुरक्षित रखते थे। भंडारण क्षमता 1600 मीट्रिक टन, किराया प्रति ञ्चिवंटल 40 रुपये वार्षिक, रोजगार 15 से 20 लोगों को मशीनमैन, वॉचमैन, स्टोरकीपर आदि पदों पर नौकरी। 1999 के सुपर साइक्लोन तक यह शीतगृह सुचारू रूप से चलता रहा। लेकिन 2001 में यह पूरी तरह बंद हो गया। वर्ष 2011-12 में इसे 'सी शोरÓ नामक एक निजी संस्था को सौंपा गया। कुछ मरक्वमत कार्य शुरू भी हुआ, लेकिन जल्द ही काम अधूरा छोड़ दिया गया। इसके बाद असामाजिक तत्वों ने दरवाजे, मशीनों के पार्ट्स, पीतल-तांबे के उपकरण और विद्युत सामग्री तक चोरी कर ली। आज यह शीतगृह खंडहर में तब्दील हो चुका है। सरकार की ओर से पुनरुद्धार के लिए अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।
लक्षेश्वर और 42 मौजा शीतगृह भी बंद
नियाली प्रखंड के लक्षेश्वर में 1982 में लगभग 4 एकड़ भूमि पर बना शीतगृह और वाणिज्य सहकारी समिति भी 2500 मीट्रिक टन क्षमता के साथ किसानों के लिए वरदान थी। लेकिन 1999 के चक्रवात के बाद यह भी बंद पड़ा है। इसी तरह कटक सदर प्रखंड के 42 मौजा क्षेत्र का शीतगृह भी वर्षों से निष्क्रिय है।
खेती प्रभावित, बढ़ी बाहरी निर्भरता
कटक जिला जो नदियों से घिरा और कृषि प्रधान क्षेत्र है, वहां के किसान अपनी आर्थिक स्थिति मजबूत रखने के लिए आलू की खेती को प्राथमिकता देते थे। लेकिन शीतगृहों के बंद होने से भंडारण सुविधा खत्म हो गई। परिणामस्वरूप किसानों ने आलू की खेती कम कर दी या पूरी तरह छोड़ दी। अब ओडिशा को अपनी जरूरत पूरी करने के लिए पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश से आलू मंगवाना पड़ रहा है। जब-जब पश्चिम बंगाल सरकार सप्लाई पर रोक लगाती है या संकट उत्पन्न होता है, तब राज्य सरकार नए शीतगृह बनाने की घोषणा करती है। लेकिन हालात सुधरते ही ये वादे ठंडे बस्ते में चले जाते हैं।
सवालों के घेरे में नीति और नीयत
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पुराने शीतगृहों का पुनरुद्धार कर आधुनिक तकनीक से लैस किया जाए, तो न केवल किसानों की आय बढ़ेगी बल्कि राज्य को बाहरी निर्भरता से भी राहत मिलेगी। कटक के किसान आज भी सरकार की ओर उक्वमीद भरी नजरों से देख रहे हैं। सवाल यह है कि क्या आलू उत्पादन की पुरानी चमक लौटेगी या जंगल में भालू, सब्जी में आलू सिर्फ एक कहावत बनकर रह जाएगी?
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विशेषकर सालेपुर प्रखंड क्षेत्र की उपजाऊ कृषि भूमि आलू उत्पादन के लिए जानी जाती रही है। महानदी और बिरूपा नदी के तटवर्ती इलाकों में हर वर्ष बड़ी मात्रा में आलू की खेती होती थी। सरस्वती पूजा के बाद किसान अपनी उपज को कोल्ड स्टोरेज में सुरक्षित रखकर ऑफ-सीजन में बेचते और अच्छा मुनाफा कमाते थे। लेकिन अब हालात बदल गए हैं। क्षेत्र के शीतगृह (कोल्ड स्टोरेज) बंद पड़े हैं, जिससे आलू की खेती में लगातार गिरावट आ रही है। किसानों की आय पर भी इसका सीधा असर पड़ा है। सरकार बंद पड़े कोल्ड स्टोरेज को फिर से चालू करने के लिए कदम उठाए तो किसानों को लाभ मिलेगा।
रविंद्र कुमार कर, पूर्व अध्यक्ष सालेपुर प्रखंड
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42 मौजा स्थित शीतल भंडार में इस क्षेत्र के साथ-साथ खंडेइता, नागबालि, निमसापुर, मत्तगजपुर, चांदुली, परमहंस आदि क्षेत्रों के किसान अपने आलू का भंडारण किया करते थे। लेकिन 1999 के महाचक्रवात के बाद से यह शीतल भंडार बंद पड़ा है, जिसके कारण किसानों को निरंतर कई प्रकार की परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। भंडारण सुविधा के अभाव में किसानों को या तो कम कीमत पर फसल बेचनी पड़ती है या फिर नुकसान उठाना पड़ता है। यदि सरकार इस शीतल भंडार का पुनर्निर्माण कर इसे पुन: चालू करे, तो स्थानीय किसान आलू उत्पादन को बढ़ाकर बेहतर लाभ अर्जित कर सकते हैं।
ज्ञान देवता, किसान, 42 मौजा
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किसान अपनी उपज को घर में अधिक समय तक सुरक्षित नहीं रख पाते। शीतगृह के अभाव में उन्हें मजबूरी में फसल तुरंत बेचनी पड़ती है, जिससे उचित मूल्य नहीं मिल पाता। उनका कहना है कि यदि कोल्ड स्टोरेज का नवीनीकरण हो जाए, तो विशेष रूप से बहुग्राम क्षेत्र के किसानों को बड़ा लाभ होगा। इससे क्षेत्र की कृषि अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिलेगी।
रश्मिता मल्लिक, सरपंच, बहुग्राम ग्राम पंचायत
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वर्ष 1998 तक कटक जिले के कई हिस्सों में बड़े पैमाने पर आलू उत्पादन होता था। बहुग्राम, लक्षेश्वर और 42 मौजा जैसे क्षेत्रों में स्थित शीतगृहों में किसान अपनी फसल सुरक्षित रखते थे और बाद में बेहतर दाम पर बेचते थे। हालांकि, वर्ष 1999 की विनाशकारी चक्रवाती तूफान ने सब कुछ बदल दिया। इस महाचक्रवात में जिले के कई शीतगृह क्षतिग्रस्त हो गए। इसके बाद राज्य सरकार ने इन शीतगृहों के पुनर्निर्माण की दिशा में प्रभावी कदम नहीं उठाए। परिणामस्वरूप आलू उत्पादन प्रभावित हुआ और किसानों की आर्थिक स्थिति कमजोर पड़ती गई।
विजन शत्पथी, पूर्व जिला परिषद सदस्य, कटक जिला परिषद