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Tuesday, Mar 17, 2026
Published on: Monday, March 16, 2026
विशेष

फीका पड़ रहा नवीन का जलवा!


अमृतांशु कुमार मिश्र
 
भुवनेश्वर : प्रदेश की राजनीति में कभी अजेय माने जाने वाले पूर्व मुख्यमंत्री नवीन पटनायक का जादू अब धीरे-धीरे फीका पड़ता दिख रहा है। 2024 के विधानसभा चुनाव में हार के बाद से बीजू जनता दल (बीजद) के भीतर बदलते समीकरणों की चर्चा तेज है और हालिया राज्यसभा चुनाव ने इन अटकलों को और हवा दे दी है। राज्यसभा चुनाव के दौरान बीजद ने कांग्रेस के साथ मिलकर साझा रणनीति बनाई थी, लेकिन इसके बावजूद पार्टी अपने उम्मीदवार को जीत दिलाने में सफल नहीं हो सकी। इतना ही नहीं, पार्टी के कुल आठ विधायकों द्वारा व्हिप की अनदेखी किए जाने की चर्चा ने भी यह संकेत दे दिया कि बीजद के भीतर पहले जैसा अनुशासन नहीं रहा। 
 
दरअसल नवीन पटनायक का राजनीतिक सफर किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं रहा है। वे ओडिशा के दिग्गज नेता और पूर्व मुख्यमंत्री बीजू पटनायक के पुत्र हैं। पिता के निधन के बाद 1997 में नवीन ने सक्रिय राजनीति में कदम रखा और उसी वर्ष बीजू जनता दल (बीजद) का गठन किया। राजनीति में आते ही उन्होंने भाजपा के साथ गठबंधन कर लिया। वर्ष 2000 में यह गठबंधन सत्ता में आया और नवीन पटनायक पहली बार ओडिशा के मुख्यमंत्री बने। इसके बाद 2004 और 2009 तक भाजपा-बीजद गठबंधन की सरकार चलती रही। हालांकि 2009 के चुनाव से पहले उन्होंने भाजपा से अलग होने का बड़ा राजनीतिक दांव चला। उस समय कई लोगों को लगा कि यह फैसला उनके लिए जोखिम भरा साबित होगा, लेकिन इसके उलट बीजद ने अकेले दम पर चुनाव जीतकर सत्ता बरकरार रखी।
 
इसके बाद 2014 और 2019 में भी नवीन पटनायक लगातार जीत दर्ज करते रहे और ओडिशा की राजनीति में उनका दबदबा लगभग निर्विवाद बना रहा।
एक समय ऐसा था जब राज्य में कहा जाता था कि ‘नवीन का नाम ही जीत की गारंटी है’। बीजद का टिकट मिलते ही उम्मीदवार की जीत लगभग तय मानी जाती थी और पार्टी में अनुशासन इतना मजबूत था कि व्हिप का उल्लंघन करना लगभग असंभव समझा जाता था। लेकिन 2024 के विधानसभा चुनाव ने इस लंबे दौर को अचानक बदल दिया। भाजपा के उभार के बीच बीजद को हार का सामना करना पड़ा और 24 साल बाद ओडिशा में सत्ता परिवर्तन हो गया।
अब हालिया राज्यसभा चुनाव में सामने आए घटनाक्रम ने भी यह संकेत दे दिया है कि पार्टी के भीतर पहले जैसी पकड़ नहीं रही।
 
कांग्रेस के साथ साझा उम्मीदवार देने के बावजूद कुछ विधायकों के अलग रुख अपनाने के कारण डॉ दत्तेश्वर होता की हार और दिलीप राय की जीत ने राजनीतिक गलियारों में यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या ओडिशा की राजनीति में कभी अजेय माने जाने वाले नवीन पटनायक का जादू अब धीरे-धीरे कम हो रहा है। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि बीजद के लिए यह दौर आत्ममंथन का है। आने वाले समय में पार्टी किस तरह अपने संगठन को फिर से मजबूत करती है और नेतृत्व के आसपास एकजुटता बनाए रखती है, यही तय करेगा कि ओडिशा की राजनीति में नवीन पटनायक का प्रभाव आगे कितना कायम रहता है।
 

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