5 किलो सिलेंडर पर रोक
भुवनेश्वर, (निप्र) : रसोई गैस (एलपीजी) की कालाबाजारी पर सख्त लगाम कसने के लिए राज्य सरकार ने कड़ा कदम उठाते हुए राज्य में अब एलपीजी की खुले बाजार में बिक्री पूरी तरह प्रतिबंधित कर दी गई है, जबकि 5 किलोग्राम के छोटे सिलेंडरों की बिक्री और रीफिलिंग पर भी पूर्ण रोक लगा दी गई है। इसके साथ ही गैस वितरण प्रणाली को पारदर्शी बनाने के लिए सभी उपभोक्ताओं के लिए ई-केवाईसी अनिवार्य कर दी गई है।
खाद्य आपूर्ति एवं उपभोक्ता कल्याण मंत्री कृष्ण चंद्र पात्र ने रविवार को इस फैसले की घोषणा करते हुए कहा कि पश्चिम एशिया में जारी युद्ध के कारण वैश्विक स्तर पर गैस आपूर्ति शृंखला प्रभावित हुई है। इसके चलते खुले बाजार में एलपीजी की कीमतों में अचानक तेज उछाल देखा गया, जिससे आम उपभोक्ताओं के लिए गैस खरीदना कठिन हो गया था। इस परिस्थिति को नियंत्रित करने और गरीब तथा मध्यम वर्गीय उपभोक्ताओं को राहत देने के उद्देश्य से सरकार ने यह सख्त कदम उठाया है।
मंत्री ने स्पष्ट किया कि अब राज्य में रसोई गैस केवल अधिकृत एजेंसियों के माध्यम से ही उपलब्ध होगी। बिना पंजीकृत या फर्जी कनेक्शन पर गैस प्राप्त करना संभव नहीं होगा। केवल वही उपभोक्ता सिलेंडर प्राप्त कर सकेंगे, जिनके नाम पर विधिवत एलपीजी कनेक्शन दर्ज है और जिन्होंने अपना ई-केवाईसी पूरा कर लिया है। इससे फर्जी कनेक्शनों, दोहराव (डुप्लीकेशन) और अवैध उपयोग पर रोक लगेगी। सरकार ने यह भी साफ कर दिया है कि अब सडक़ किनारे, बाजारों या अनधिकृत दुकानों पर एलपीजी की बिक्री पूरी तरह प्रतिबंधित रहेगी।
विशेष रूप से 5 किलो के छोटे सिलेंडरों को कालाबाजारी का प्रमुख माध्यम मानते हुए इन पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया गया है। अधिकारियों का कहना है कि छोटे सिलेंडरों के जरिए अवैध व्यापारियों को बड़े पैमाने पर मुनाफा कमाने का अवसर मिल रहा था, जिसे अब पूरी तरह बंद कर दिया गया है। राज्यभर में कालाबाजारी के खिलाफ व्यापक अभियान शुरू किया गया है। निगरानी तंत्र को मजबूत किया गया है और जिला स्तर पर विशेष टीमों को सक्रिय किया गया है, जो गैस के अवैध भंडारण, परिवहन और बिक्री पर नजर रख रही हैं।
सरकार ने चेतावनी दी है कि यदि कोई व्यक्ति या समूह एलपीजी की अवैध खरीद-बिक्री या भंडारण में शामिल पाया जाता है, तो उसके खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाएगी। ई-केवाईसी प्रणाली को इस अभियान का सबसे अहम हिस्सा माना जा रहा है। इस डिजिटल सत्यापन प्रक्रिया के तहत उपभोक्ताओं की पहचान और कनेक्शन का मिलान किया जाएगा, जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि सब्सिडी और गैस की आपूर्ति केवल वास्तविक लाभार्थियों तक ही पहुंचे।
इससे वितरण प्रणाली में पारदर्शिता आएगी और गड़बड़ियों की संभावना काफी हद तक समाप्त होगी। मंत्री कृष्ण चंद्र पात्र ने कहा, हम कालाबाजारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई कर रहे हैं और कहीं भी ऐसी गतिविधियों को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। राज्य में रसोई गैस की आपूर्ति पूरी तरह पर्याप्त है और किसी प्रकार की कमी नहीं है। शहरी क्षेत्रों में 25 दिनों के भीतर और ग्रामीण क्षेत्रों में 45 दिनों के भीतर गैस उपलब्ध कराई जा रही है। अब यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि गैस केवल सही उपभोक्ताओं तक ही पहुंचे, न कि खुले बाजार में बेची जाए।
सरकार ने आम जनता से अपील की है कि वे किसी भी प्रकार की अफवाहों पर ध्यान न दें और घबराहट में गैस की अतिरिक्त खरीद न करें। अधिकारियों ने भरोसा दिलाया है कि राज्य में पेट्रोल, डीजल और एलपीजी का पर्याप्त भंडार उपलब्ध है और आपूर्ति व्यवस्था पूरी तरह सुचारू रूप से संचालित हो रही है।
दीर्घकालिक समाधान की दिशा में सरकार ने यह भी संकेत दिया है कि प्रमुख शहरी क्षेत्रों में पाइप्ड नेचुरल गैस (पीएनजी) नेटवर्क का तेजी से विस्तार किया जा रहा है।
इससे भविष्य में सिलेंडरों पर निर्भरता कम होगी और उपभोञ्चताओं को अधिक सुरक्षित, सस्ती और निरंतर गैस आपूर्ति मिल सकेगी। सख्त नियमों, डिजिटल निगरानी और बढ़ी हुई प्रशासनिक सक्रियता के साथ ओडिशा सरकार का यह कदम न केवल कालाबाजारी पर प्रभावी रोक लगाने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है, बल्कि इससे आम उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा और ऊर्जा संसाधनों के न्यायसंगत वितरण को भी सुनिश्चित करने की उम्मीद जताई जा रही है।
छोटे सिलेंडर बंद होने से बढ़ेगी मुश्किल
हालांकि राज्य में छोटे सिलेंडरों के बंद होने से ऐसे हजारों लोगों के लिए मुश्किल भी खड़ी हो जाएगी जो 5 किलोग्राम वाले छोटे सिलेंडरों पर ही निर्भर हैं। इनमें बड़ी संख्या में बैचलर युवा, किराए पर रहने वाले लोग और अपने परिवार से दूर काम करने वाले कर्मचारी शामिल हैं। सरकार के इस फैसले से इन वर्गों को खासी परेशानी का सामना करना पड़ सकता है, क्योंकि छोटे सिलेंडर उनके लिए सस्ता और सुविधाजनक विकल्प था।
अब उनके सामने भोजन बनाने जैसी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने में कठिनाई उत्पन्न होने की आशंका है। विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार को ऐसे उपभोक्ताओं के लिए वैकल्पिक व्यवस्था पर भी विचार करना होगा, ताकि उन्हें इस निर्णय का सीधा और नकारात्मक प्रभाव न झेलना पड़े।